Tue. Aug 4th, 2020

भारत को वर्तमान में कृषि नीति पर बदलाव की अत्यंत आवश्यकता है??

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हम लोग बचपन से पढ़ते और सुनते आये है भारत एक कृषि प्रधान देश है यहा की अर्थव्यवस्था कूषि पर टीकी हुई है, यह सब जानते और समझते हुये भी यदि हम कृषि के महत्व को ना समझे और इस और ध्यान ना दे तो देश के विकास की बात करना महज एक कल्पना होगी ।

आज हमे अपनी गलत नीतियों के कारण समय -समय पर बहुत से अन्न का आयात करना पड जाता है। जिसे की हम निर्यात मे बदल सकते हैं।
आजादी के इतने बरसो बाद भी देश में आज तक कोई ठोस कृषि नीति नहीं बनी है। जो की हमारा और देश का दुर्भाग्य है। अब तक जो भी नीतियां सरकारो द्वारा बनाई गई है उनके चलते ना तो देश का भला हो सकता है और ना ही देश के किसानों का एयर कंडीशनर रूम में बैठकर सुट -बुट पहनकर और टाई लगाकर जो लोग कृषि नीति बनाते हैं उन लोगो का कृषि की वास्तविकता से दूर -दूर तक कोई नाता नहीं होता है। जिसके चलते कृषि नीति में ना आज तक सुधार हुआ है और ना ही भविष्य में कोई उम्मीद की जा सकती है।

 

शहरो के विकास में जो भी राशि खर्च की जाती हैं उसका 25 प्रतिशत भी यदि सरकार कृषि और गाँव के विकास में खर्च करे तो देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार हो सकता है और देश का हर नागरिक खुशहाल ज़िन्दगी जी सकता है।

आज जरूरत है कृषि नीति मे बदलाव की किसानों का हौसला बढाने की और कृषि कार्य में आ रही समस्या के निराकरण करने की समय पर उत्तम क्वालिटी के बीज उपलब्ध कराने की । समय पर खाद उपलब्ध कराने सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध कराने की। भूमि की उर्वराशाक्ति को कैसे बनाया रखा जाये इस बात की जानकारी देने की। फसल तैयार होने पर मंडियो तक अनाज सुगमता से पहुँचाया जा सके ऐसी व्यवस्था करने की, मंडियो में तौल और मोल की निष्पक्षता की, समर्थन मूल्य मे आनाज खरीदे जाने की व्यवस्था बनाने की, खेती को घाटे के धंधे से बाहर निकालने की ओर यह तभी संभव है जब खेतो के मेड तक पहुंचकर योजनाबनाने वाले ईमानदारी से किसानाे को उचित राय और सहयोग देने पर ध्यान दे तो , यदि सरकार इस और ध्यान दे तो देश की अर्थ व्यवस्था के साथ -साथ बेरोजगारी की समस्या का भी बडी आसानी से संकट दूर किया जा सकता है , आज किसान खेती को घाटे का धंधा मानकर बे मन से खेती कर रहा है और अपने परिवार कौ शहर मे नौकरी के लिये भेज देता है .इसका परिणाम यह होता है कि परिवार का सदस्य नौकरी के लिये इधर -उधर चक्कर लगाता है दोनों ही दशा मे देश का बहुत बडा नुकसान होता है एक और जहॉ किसान बेमन से खेॆती करता है इसके चलते खेती बिगड जाती है वही दूसरी तरफ देश का युवा वर्ग बेकारी बेरौजगारी और भूखमरी का जीवन जीने को मजबूर रहता है ,आज गांव मे 70 प्रतिशत के लगभग आबादी रहती है यदि सरकार अपनी कृषि नीति इन आबादी को ध्यान मे रखकर बनाये तो अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ -साथबेरोजगारी को भी दूर किया जा सकता है |

सरकारे यदि वास्तव मे इस देश और देशवासियो का विकास चाहती है तो सबसे पहले किसानों के साथ राजनीति बंद करना होगी और दिल से उसकी वास्तविक समस्या को समझना होगा और उसके निदान हेतु हर संभव प्रयास करना होगा और यह तभी संभव है जब कृषि नीति बनाने वाले एयर कंडिशनर रूम से बाहार आकर किसानों के पास पहुँच कर उचित मार्ग दर्शन के साथ हर संभव सहयोग करने की सौच रखे  उचित शिक्षा के अभाव मे देश का किसान वही पुराने तरीके से सदियो से एक जैसी खेती करता आ रहा है जिसके चलते इसका फायदा न तो किसान उठा पा रहा है ना ही देश ,सरकार को किसानो की खेतो की मिट्टी का परिक्षण कर उचित खेती करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये उत्तम प्रकार के बीज की समय पर उपलब्धता करवानी चाहिये समय पर खाद एंवम पानी की व्यवस्था करवाना चाहिये फसलो को बोने से लेकर उसकी कटाई तक निगरानी करते हुये कृषि व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना चाहिये बगैर कृषि और कृषक के देश का विकास असंभव है हमे इस बात को समझने की आवशयकता है प्राकृतिक आपदा एवंम अन्य कारणो से फसल खराब होने पर निष्पक्ष रूप से समय पर भरपाई होनी चाहिये यदि ऐसी व्यवस्था बने तो हमारा किसान पूरी लगन और मेहनत के साथ कृषि के विकास मे हर संभव प्रयास करने को तयार रहेगा और जो लाखो किसान हर साल दुखी होकर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लेता है उस पर भी अंकुश लगेगा |

 

इसे समझ कर जिस दिन से अपनी नीति मे बदलाव कर दिया जायेगा उस दिन से देश और देशवासियो का विकास अपने आप होता चला जायेगा हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का स्तम्भ कृषक और कृषि है इस बात को सदैव याद रखने की जरूरत है यदि हम इसे याद रखते है तो भारत सोने की चिडिया थी और आगे भी सोनै की चिडिया रहेगी |

 

 

:- अशोक तिवारी

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