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” विकास तु कहाँ छुपा बैठा है ” | | पंडित अशोक तिवारी

VIKAS TU KAHAN CHUPA BAITHA HAIVIKAS TU KAHAN CHUPA BAITHA HAI

VIKAS TU KAHAN CHUPA BAITHA HAI

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विकास तु कहाँ छुपा बैठा है

मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया,
चाँद की चाँदनी में
सुरज की लाली में
बंसत की हरियाली में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
खुले आसमान में
खेत और खलिहान में
घर की चार दिवारी में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
जगती आँखों में
सोती रातो में
लोगों की बातो में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
बरसते पानी में
ठण्ड की ठिठुरन में
गर्मी की तपीश में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
बच्चों के जीवन में
युवाओ के रोजगार में
बुजुर्गओ के ख्यालो में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
लोगों के जज्बातो में
गरीब की बातों में
राशन की दुकानो में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
बाग और बागानो में
मण्डी की दुकानो में
किसान की मुस्कानो में
मैने तुझे हर तरफ ढुढा पर तु कही नजर नही आया
विकास तु कहाँ छुपा बैठा है
तेरी हर तरफ बहुत पुकार है
तुझ से मिलने को दिल बेकरार है
एक बार तु मिल अपना पता बतला
मै भी तो देखु तु दिखता कैसा है
क्यो की चारो और तेरा बहुत डंका है।।

:-    उक्त पंक्तिया अशोक तिवारी द्वारा रचित

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